
नीट (NEET) का वह ‘कागज’: एक सपना जो टूटते-टूटते रह गया
आज जब मैं खिड़की के बाहर देख रहा हूँ, तो आसमान का रंग कुछ बदला-बदला सा लग रहा है। शायद यह मेरे मन के भीतर चल रहे तूफ़ान का ही प्रतिबिंब है। कल तक जिस कमरे में मेजों पर किताबों का पहाड़ था, आज वहां एक अजीब सी खामोशी पसरी है।
कल तक जो 'नीट' (NEET) की परीक्षा एक भविष्य की चाबी लगती थी, आज वह केवल एक ठंडी खबर बनकर रह गई है—"परीक्षा रद्द कर दी गई है।"
यह सुनने में बस एक वाक्य है, लेकिन उन लाखों छात्रों के लिए, जिन्होंने बीते दो सालों से अपनी जवानी, अपनी नींद और अपनी खुशियों को एक कमरे में कैद कर लिया था, यह एक वज्रपात जैसा है।
वह संघर्ष जो पन्नों में कैद था
याद है मुझे, वह आखिरी रात जब मैंने और मेरे जैसे हज़ारों साथियों ने अपनी पूरी ताकत लगा दी थी। आंखों के नीचे काले घेरे, हाथ में हाइलाइटर और दिमाग में हजारों फॉर्मूले—हमने सिर्फ डॉक्टर बनने का सपना नहीं देखा था, हमने उस सपने को जिया था।
मेरी माँ ने उस सुबह दही-चीनी खिलाते हुए कहा था, "जा बेटा, आज तेरी मेहनत का फल मिलने वाला है।" उस वक्त मेरे पिता की आंखों में जो गर्व था, वह मेरी सबसे बड़ी पूंजी थी। हमने अपनी सारी उम्मीदें उस ओएमआर शीट (OMR Sheet) के गोलों में भर दी थीं।
जब सब कुछ मिट्टी में मिल गया
परीक्षा खत्म हुई, तो लगा कि आधी जंग जीत ली। फिर आई वह मनहूस खबर। अचानक सब कुछ बेमानी लगने लगा। क्या वह रातें, वह कोचिंग की बोरियत, वह त्यौहारों का त्याग—सब बेकार था?
सबसे दर्दनाक वह अहसास है जब आपको पता चलता है कि आपकी मेहनत की नींव किसी की लापरवाही या सिस्टम की विफलता की धूल में दब गई है। यह सिर्फ एक परीक्षा का रद्द होना नहीं है, यह एक साल का पूरा 'जीवन' छिन जाने जैसा है। हमारे भविष्य के पन्नों को किसी ने बेपरवाही से फाड़ दिया है।
क्या हम फिर से लड़ पाएंगे?
कुछ लोग कहते हैं, "कोई बात नहीं, फिर से तैयारी कर लेना।" उन्हें कौन समझाए कि तैयारी सिर्फ किताबों को दोबारा पढ़ना नहीं होता। तैयारी दोबारा उस मानसिक दबाव को झेलना है, दोबारा उस अकेलेपन से गुज़रना है, और सबसे बड़ी बात—दोबारा उस उम्मीद को जगाना है जिसे हमने कल ही टूटते हुए देखा था।
लेकिन...
खामोशी के बीच भी एक उम्मीद की किरण है। हम भले ही टूट गए हैं, पर खत्म नहीं हुए हैं। हम वो योद्धा हैं जिन्होंने सफेद कोट पहनने का ख्वाब देखा है। यह समय कठिन है, दिल दुखा हुआ है, लेकिन हार मान लेना हमारे डीएनए में नहीं है।
आज मैं रो रहा हूँ, शायद कल भी रोऊँ। लेकिन परसों... परसों मैं फिर से अपनी किताबें उठाऊंगा। शायद इस बार मेरा इरादा और भी पक्का होगा।
यह नीट का एग्जाम रद्द हुआ है, मेरा डॉक्टर बनने का इरादा नहीं। उन सभी साथियों से कहना चाहता हूँ जो इस वक्त इस दर्द को झेल रहे हैं—तुम अकेले नहीं हो। हम सब साथ में इस टूटे हुए सपने को फिर से जोड़ेंगे। हम फिर से लड़ेंगे, और इस बार जीत और भी शानदार होगी।
क्योंकि हारकर जीत जाने वाले को ही बाजीगर कहते हैं, और हम तो भावी डॉक्टर हैं!
- क्या आप भी इस दौर से गुजर रहे हैं? अपनी बात नीचे कमेंट्स में लिखें। चलिए साथ मिलकर इस बोझ को कम करते हैं।